November 21, 2017

Latest News

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से ही श्राद्धपक्ष उचित, मदिरा भोग की नई परम्परा अनुचित, उज्जयिनी विद्वत परिषद की बैठक में हुआ निर्णय

 

उज्जैन 06 सितम्बर। श्राद्ध पक्ष आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या तक माना जाना शास्त्र सम्मत है, साथ ही आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को भी श्राद्धपक्ष में शामिल करते हुए इस दिन  भी श्राद्ध करने की परम्परा है, परन्तु पूर्णिमा से श्राद्ध का प्रारम्भ उचित नहीं है। जिनका निधन पूर्णिमा के दिन हुआ है, उनका श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या को किया जाना विहित है। इसी प्रकार बच्चों का श्राद्ध पंचमी, सौभाग्यवतियों का श्राद्ध नवमी, शस्त्रहतों का श्राद्ध चतुर्दशी तथा सन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी को किया जाना शास्त्र सम्मत है, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी तिथि को हुई हो।

उज्जयिनी विद्वत परिषद की श्री रामजानकी मन्दिर नीलगंगा में सम्पन्न बैठक में यह निर्णय लिया गया। बैठक में विद्वत परिषद के अध्यक्ष डॉ.मोहन गुप्त, डॉ.भगवतीलाल राजपुरोहित, प्रो.बालकृष्ण शर्मा, पं.श्यामनारायण व्यास, डॉ.सदानन्द त्रिपाठी, डॉ.संतोष पण्ड्या उपस्थित थे।

मदिरा भोग की नई परम्परा अनुचित

परिषद के सचिव डॉ.सन्तोष पण्ड्या ने बताया कि बैठक में निर्णय लिया गया कि गढ़कालिका मन्दिर में मदिरा भोग की नई परम्परा अनुचित है। इसी प्रकार अन्य देव मन्दिरों में मदिरा की धारा का प्रसाद लगाए जाना शास्त्र सम्मत नहीं है। इसके स्थान पर प्रतीक रूप में ही मदिरा का अर्पण किया जा सकता है।

प्रतिदिन भांग का प्रसाद एवं श्रृंगार अनुचित

विद्वत परिषद ने बताया कि भगवान शिव को भांग का नैवेद्य तथा भांग का श्रृंगार का कोई शास्त्रीय अथवा पारम्परिक प्रमाण नहीं है। यह परवर्ती व्यवस्था बन गई है। आज से 50 वर्ष पूर्व भगवान महाकाल को केवल रक्षाबंधन पर ही भांग का भोग लगाया जाता था, अन्य अवसरों पर नहीं। वर्तमान में आएदिन भांग का नैवेद्य तथा भांग से श्रृंगार किया जा रहा है, जो उचित नहीं है। साथ ही बाजार से मिलने वाली भांग में अनेक अम्लीय एवं क्षारीय पदार्थ मिलाए जाते हैं, जिससे शिवलिंग का क्षरण होता है।

रासायनिक रंगों एवं पदार्थों से श्रृंगार अनुचित

परिषद ने बताया कि भगवान महाकाल का रासायनिक रंगों एवं पदार्थों से विविध श्रृंगार किया जाना भी उचित नहीं है। साथ ही सेंट व स्प्रे किया जाना भी ठीक नहीं है। रासायनिक पदार्थों के लेपन एवं उनसे श्रृंगार करने से शिवलिंग का क्षरण होता है। अत: केवल चन्दन आदि प्राकृतिक एवं पवित्र वस्तुओं तथा वस्त्र आभूषणों से ही भगवान महाकाल का श्रृंगार किया जाना चाहिए।

शिवलिंग निरवयव और निष्कल

परिषद ने बताया कि शिवलिंग निरवयव और निष्कल होता है। लिंगार्चन की ही शास्त्रीय विधि है। उनकी आराधना सावयव देवता के रूप में करना उचित नहीं है। अत: महाकाल शिवलिंग पर प्रतिदिन अनेकानेक देवताओं की आकृतियां बनाकर श्रृंगार नहीं किया जाना चाहिए। यह शास्त्र सम्मत नहीं है।

क्रमांक 3054                                      पंकज मित्तल (मो.नं.-9301209255)/जोशी