August 20, 2018

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जिन व्यक्तियों की वार्षिक आय 1 लाख रूपये से अधिक न हो, विधिक सेवा पाने के पात्र हैं

 

उज्जैन 13 फरवरी। कोई भी व्यक्ति धन की कमी या अन्य किसी कारणों से अपने अधिकारों से वंचित न हो अथवा वकील के अभाव में अपना पक्ष रखने में असमर्थ है या न्यायालय में अपना मामला लगाना चाहता है, ऐसी स्थिति में कानून उसे वकील की सुविधा प्रदान करता है। इसे विधिक सहायता कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति जिनका विवाद उच्चतम न्यायालय के समक्ष है और जिसकी समस्त स्त्रोतों से वार्षिक आय एक लाख रूपये से ज्यादा न हो, वह विधिक सेवा पाने का पात्र होता है।

विधिक सहायता पाने के अन्य हकदार व्यक्तियों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के सदस्य मानव दुर्व्यवहार या बेगार का सताया हुआ व्यक्ति, स्त्री या बालक, मानसिक या शारीरिक रूप से असमर्थ व्यक्ति, वह व्यक्ति जो अनपेक्षित अभावों जैसे बहुविनाश, जातीय हिंसा, अत्याचार, बाढ़, सूखा, भूकंप, औद्योगिक विनाश की दशाओं के अधीन सताया हुआ व्यक्ति, वह व्यक्ति जो कोई औद्योगिक कर्मकार है तथा वह व्यक्ति जो अभिरक्षा में है, इसके अन्तर्गत अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम-1956 के तहत किसी संरक्षण गृह में या किशोर न्याय अधिनियम-1986 के अन्तर्गत किसी किशोर गृह में या मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम-1987 के अन्तर्गत किसी मनोचिकित्सीय अस्पताल या मनोचिकित्सीय परिचर्या गृह में अभिरक्षा में रखा गया व्यक्ति है, विधिक सहायता पान के हकदार होते हैं।

विधिक सहायता के तहत जो सुविधाएं दी जाती हैं, उनमें कोर्ट फीस, आदेशिका फीस, साक्षियों तथा पेपरबुक के व्यय, वकील फीस और कानूनी कार्यवाहियों के सम्बन्ध में देय समस्त खर्च शामिल हैं। विधिक सहायता के तहत कानूनी कार्यवाहियों में वकील उपलब्ध कराया जाता है। कानूनी कार्यवाहियों के निर्णय, आदेशों, साक्ष्य की टिप्पणियों तथा अन्य दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियां उपलब्ध कराई जाती हैं। कानूनी कार्यवाहियों में पेपरबुक तैयार करने, जिसमें दस्तावेजों के मुद्रण, टंकण तथा अनुवाद के खर्चे शामिल हैं एवं किसी कानून मामले में कानूनी सलाह देने की सुविधा भी मिलती है।

विधिक सहायता प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्ति जिन न्यायालयों में आवेदन कर सकते हैं, उनमें दीवानी न्यायालय, फौजदारी न्यायालय, राजस्व न्यायालय, श्रम न्यायालय, परिवाद न्यायालय तथा उपभोक्ता फोरम शामिल हैं।

मध्यस्थ योजना

अदालतों के अतिरिक्त विवादों को निपटाने का एक कानूनी तरीका मध्यस्थता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अदालती कार्यवाही से पृथक विवादों को सुलझाने का एक नया तरीका मध्यस्थता है, जो आम नागरिक को परम्परागत न्याय प्रदान करने वाली संस्थाओं से जटिल एवं लम्बी प्रक्रिया से मुक्ति दिलाने के साथ शीघ्र, सस्ता एवं नि:शुल्क न्याय प्रदान करने का साधन है। मध्यस्थता हेतु स्वयं पक्षकार तय करते हैं कि वे अपना मामला मध्यस्थता से निराकरण कराना चाहते हैं तथा उभयपक्ष मध्यस्थ योजना का लाभ लेते हैं। इस योजना में न्यायाधीश, अधिवक्ता, प्रशासनिक अधिकारी तथा सामाजिक कार्यकर्ता मध्यस्थ हो सकते हैं।

मध्यस्थता के लाभ

मध्यस्थ योजना विवादों का आपसी बातचीत, सुलह एवं समझौते के माध्यम से समाधान करती है। विवाद में लिप्त पक्षकारों के आपसी रिश्तों में सुधार होता है। मध्यस्थता की कार्य प्रणाली ऐसा मंच उपलब्ध कराती है, जहां दोनों पक्ष तीसरे निष्पक्ष या मध्यस्थ के सामने विवाद और उनसे जुड़े अपने हित के बारे में एक-दूसरे के साथ खुलकर बातचीत करते हैं। मध्यस्थ प्रक्रिया विवाद को सुलझाने का एक सुअवसर प्रदान करती है। विवाद में लिप्त लोगों का समझौते की कार्यवाही तथा उसके परिणाम पर पूरा नियंत्रण होता है। मध्यस्थ कार्यवाही में विवाद के दोनों पक्ष समझौते की शर्त स्वयं तय करते हैं। मध्यस्थ कार्यवाही में दोनों पक्षों की समान जीत होती है। ये विवाद के समाधान की खर्चरहित प्रणाली है।

आवेदन कहां करें

न्यायालय में लम्बित मामलों के पक्षकार सम्बन्धित न्यायालय में अपने मामले को मध्यस्थता कार्यवाही के माध्यम से निराकरण कराने हेतु आवेदन लिखित में या मौखिक रूप से निवेदन कर सकते हैं। उभयपक्षों में कोई भी पक्षकार मीडिएशन कार्यवाही के लिये आवेदन जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में दे सकता है। अगर कोई व्यक्ति अपना मामला न्यायालयीन प्रक्रिया के अतिरिक्त किसी विवाद का न्यायालय में दर्ज होने के पूर्व निराकरण कराना चाहता है तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति मध्यस्थता कार्यवाही के लिये जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को आवेदन दे सकता है।

क्रमांक 0458                                                               एचएस शर्मा/जोशी