September 21, 2018

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सम्राट विक्रमादित्य की आयु 137 वर्ष की थी, उन्होंने 100 वर्षों तक उज्जयिनी में शासन किया, देश के ही नहीं, बल्कि विदेशों के भी ग्रंथों और साहित्य में मिलता है सम्राट विक्रमादित्य का वर्णन, जन-जन के मानस पटल में अंकित हैं वीर विक्रमादित्य की शौर्य गाथाएं, सम्राट विक्रमादित्य के साहित्यिक साक्ष्यों पर शोध संगोष्ठी आयोजित

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उज्जैन 13 मार्च। विक्रम संवत 2075 विक्रमोत्सव के दूसरे दिन स्वराज संस्थान संचालनालय मध्य प्रदेश शासन संस्कृति विभाग द्वारा सिंधिया प्राच्य संस्थान विक्रम विश्वविद्यालय एवं महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ के संयुक्त तत्वावधान में सिंधिया प्राच्य शोध संस्थान के सभाकक्ष में सम्राट विक्रमादित्य के साहित्यिक साक्ष्यों पर शोध संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ.भगवतीलाल राजपुरोहित ने की। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ.केदारनाथ शुक्ल तथा श्री राजेन्द्र कुमार व्यास थे। कार्यक्रम की रूपरेखा सिंधिया शोध संस्थान के प्रोफेसर डॉ.बालकृष्ण शर्मा द्वारा बताई गई। अतिथियों द्वारा सम्राट विक्रमादित्य के चित्र के समक्ष दीप दीपन कर और पुष्पमाला अर्पित कर संगोष्ठी का शुभारम्भ किया गया।

डॉ.भगवतीलाल राजपुरोहित ने सम्राट विक्रमादित्य से सम्बन्धित साहित्य पर प्रकाश डालते हुए बताया कि विभिन्न संस्कृत साहित्यों में सम्राट विक्रमादित्य का वर्णन मिलता है। अठारह पुराणों में से तीन पुराण स्कंदपुराण, भविष्यपुराण और भविष्योत्तर पुराण में की गई व्याख्या के अनुसार कलि संवत 3000 में विक्रमादित्य हुए थे। इस हिसाब से सम्राट विक्रमादित्य का जन्म 101 ईसापूर्व में किया गया। स्कंदपुराण विक्रमादित्य के राज्यारोहण के बारे में वर्णन मिलता है।

इसके अनुसार सम्राट विक्रमादित्य जब केवल 20 वर्ष की आयु के थे, तब उनका राज्याभिषेक किया गया। इतिहास के अनुसार यह घटना 81 ईसापूर्व की है। 57 बीसी में विक्रमादित्य द्वारा विक्रम संवत प्रारम्भ किया गया। ये निश्चित तिथियां हमें पुराणों के माध्यम से प्राप्त होती हैं। इसी कड़ी में आगे पता चलता है कि सम्राट विक्रमादित्य की आयु लगभग 137 वर्ष 7 माह और 15 दिन की थी। उज्जैन में उन्होंने लगभग 100 सालों तक शासन किया। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य उनके प्रतिस्पर्धी और उन्हीं के समान गुणवान थे। इस बात की जानकारी भविष्योत्तर पुराण में मिलती है।

सम्राट विक्रमादित्य द्वारा स्वयं भी कई साहित्य लिखे गये। गंधकवार्दन उनके द्वारा रचित साहित्य है। इसके अलावा संसारावर्त नामक शब्दकोष भी उनके द्वारा लिखा गया। सम्राट विक्रमादित्य द्वारा धनुर्विद्या के आधार पर एक पुस्तक भी लिखी गई थी।

डॉ.किरण रमण सोलंकी द्वारा सम्राट विक्रमादित्य से सम्बन्धित साहित्यिक साक्ष्यों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा गया कि उज्जैन के संवत प्रवर्तक राजा विक्रमादित्य की उनके युग में वैश्विक पहचान रही है। इनकी लोकप्रियता से सम्बन्धित साहित्य देश-विदेश में विस्तारित है। सम्राट विक्रमादित्य की शौर्य गाथाएं जन-जन के मानस पटल पर अंकित हैं। हर किसी के पास विक्रमादित्य की एक अलग कहानी, किवदंती और अनुश्रुति मौजूद है। सम्राट विक्रमादित्य को लेकर पुरातत्वविद अक्सर तथ्यों के अभाव में मौन रहते थे, लेकिन आज पुराजगत में सम्राट विक्रमादित्य के प्रचुर मात्रा में पुरा-साक्ष्य उपलब्ध हो चुके हैं।

सम्पूर्ण भारत में प्रथम शताब्दी ईसापूर्व से लेकर आज तक विक्रमादित्य से सम्बन्धित साहित्यिक साक्ष्य के प्रस्तुतिकरण में विद्वानों की सहभागिता महत्वपूर्ण रही है। भारत की सभी भाषाओं के साहित्य में तथा सभी प्रान्तों में विक्रमादित्य को लेकर प्रभावशाली कथाएं आमजन में प्रसिद्ध हैं। भारत प्राचीनकाल से विश्व के व्यापार का भी बड़ा केन्द्र रहा है। सम्राट विक्रमादित्य के  अनेक प्रसंग विदेशों में भी चर्चित हैं, क्योंकि अक्सर विदेश के व्यापारियों का भारत में आवागमन होता रहता था और उन्हें विक्रमादित्य की ख्याति के बारे में पता चलता था, जिसे वे अपने देशों में जाकर बताते थे। विक्रमादित्य के सभी प्रसंग राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत हैं। उन्होंने अपने अद्वितीय युद्धकौशल से न केवल शकों को खदेड़ा, बल्कि सम्पूर्ण भारत को एकसूत्र में बांधा है। अपने अदम्य उत्साह और अप्रतिम साहस के द्वारा वे धर्म, कला और साहित्य के संरक्षक तथा आश्रयदाता रहे।

चीनी यात्री शुवान 630 ईस्वी में भारत आया था, तब उसने विक्रमादित्य से सम्बन्धित जानकारियों को एकत्र किया और अपने ग्रंथ सियूकी में उसके बारे में सविस्तार लिखा। इस वृत्तांत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सम्राट विक्रमादित्य बड़े उदार शासक थे। चीनी यात्री के अनुसार विक्रमादित्य की राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण कार्यों की एक लम्बी श्रृंखला थी, जिसे चीन के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े सम्मान के साथ सुना जाता रहा है। चीन में सम्राट विक्रमादित्य को ‘छावजीर’ नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ होता है- विक्रमण करना, ऊपर निकलना तथा आदित्य के समान तेजोमय।

अरबी साहित्य में किताबुल हिन्द नामक एक ग्रंथ है, जिसकी रचना 1030 ईस्वी के आसपास मानी जाती है। इसके लेखक अल बरूनी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की चर्चा करते हुए उनके नवरत्नों में से एक रत्न वैज्ञानिक व्यांडी का ससम्मान उल्लेख किया है। व्यांडी को लेकर किताबुल हिन्द में एक विस्तृत वृत्तांत भी है। इसके अलावा फारसी के अनेक ग्रंथों में भी महाराजा विक्रमादित्य के अनेक प्रसंगों की चर्चा है। अकबरी हाल विषयक ग्रंथों आईने अकबरी और मुन्तरतबुततवारीख में विशेषकर विक्रम संवत से सम्बन्धित प्रसंग है। इन ग्रंथों के साथ ही तारीखे फरिश्ता में भी विक्रमादित्य को विक्रमजीत नाम से सम्बोधित करते हुए रोचक प्रसंगों का वर्णन किया गया है।

डॉ.शिव चौरसिया ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सम्राट विक्रमादित्य आम जनमानस में हमेशा से रचे-बसे हैं। उनके कार्यकाल को लेकर अक्सर इतिहासकारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उनके अस्तित्व के अत्यन्त ठोस प्रमाण अब मौजूद हैं। सम्राट विक्रमादित्य की उपाधि भी कई राजाओं को दी गई। विभिन्न ग्रंथों में उनसे जुड़ी हुई कई रोचक कहानियां लिखी गई। साहित्यकारों द्वारा कभी ऐसा नहीं किया गया कि किसी महापुरूष के जीवन के उज्ज्वल पक्ष के बारे में ही सदैव उन्होंने लिखा हो, लेकिन सम्राट विक्रमादित्य एक अपवाद हैं, जिनकी सदैव प्रशंसा और महिमा-मंडन ही साहित्य में किया गया। ऐसे राजा इतिहास में बहुत कम देखने में आते हैं।

सम्राट विक्रमादित्य जनता के राजा रहे हैं। वे किसी थोपे हुए राजा के समान नहीं थे, बल्कि प्रजा के लिये सर्वोपरि और सर्वमान्य थे। श्री राम और श्री कृष्ण के बाद सम्राट विक्रमादित्य को भी जननायक माना गया है, क्योंकि जब जनता स्वयं अपनी स्वेच्छा और खुशी से किसी को अपना राजा मान सिंहासन पर बैठाती है तो वह सम्राट जनता का नायक कहलाता है। भारत के इतिहास में कई राजाओं ने भीषण युद्ध कर खून की नदियां बहाकर राज्य किया, लेकिन वे कभी जनता के हृदय में वह स्थान नहीं बना सके। अरबी साहित्य में तो यहां तक कहा गया है कि वे लोग धन्य हैं, जिन्हें राजा विक्रमादित्य के राज्य में अपना जीवन यापन करने का सौभाग्य मिला। अभिज्ञान शाकुंतलम की कृतियों में भी सम्राट विक्रमादित्य का वर्णन मिलता है।

डॉ.जीवनसिंह ठाकुर ने कहा कि इतिहास के ऐसे चरित्र ही सदैव अमर रहते हैं, जो किताबों से बाहर निकलकर जनता के हृदय में बस जाते हैं। सम्राट विक्रमादित्य की कथाएं आमजन द्वारा पीढ़ियों से अपने बच्चों को सुनाई जाती रही हैं। बेताल पच्चीसी की सारी कहानियां अहिंसा, शिक्षा और सदाचार पर समाप्त होती हैं। विक्रमादित्य की समस्त कथाओं का वर्तमान में संकलन किया जाना आवश्यक है। विक्रमादित्य की नैतिक सत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण तो स्वयं जनता है।

डॉ.अजीता त्रिवेदी ने संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मराठी लेखक स्व.श्री कृष्णाजी पांडुरंग कुलकर्णी ने आज से लगभग 100 से 125 वर्ष पूर्व अपनी कविताओं के माध्यम से सम्राट विक्रमादित्य के साम्राज्य का वर्णन किया था। इन वांग्मय कथाओं में वर्णन मिलता है कि विदेशी साहित्यकारों के मन में जितना आकर्षण अवन्तिका नगरी के प्रति था, उतनी ही श्रद्धा यहां के सम्राट विक्रमादित्य के प्रति थी। विक्रमादित्य के आदर्श, पराक्रम, परोपकार, सहनशीलता और संकटों से उबरने में उनकी दक्षता अद्वितीय है। सम्राट विक्रमादित्य वांग्मय के कथा नायक थे। उनके प्रसंगों में सभी तत्व, गुण और सभी तरह के गणों की झलक दिखाई देती है। अश्वमेघ यज्ञ करना और अपने नाम से संवत की स्थापना करना उनके चक्रवर्ती राजा होने के प्रमाण हैं।

आचार्य श्री शैलेन्द्र शर्मा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मंगोलीयन भाषा में एक ग्रंथ लिखा गया है, जिसका नाम है ‘अशरीभुजी’। इसमें सम्राट विक्रमादित्य की 32 पुतलियों द्वारा राजा भोज को बताई गई कथाओं का वर्णन मिला है। इसका बाद में रूसी और फ्रेंच भाषा में भी अनुवादन किया गया। सम्राट विक्रमादित्य के आम जनता के साथ सम्बन्धों के बारे में भी इस ग्रंथ में कई प्रमाण मिले हैं। शुक सप्तशती विष्णुपुराण और स्कंदपुराण में भी कई महत्वपूर्ण प्रसंगों की चर्चा की गई। इसके अलावा जैन धर्म के कई साहित्य ग्रंथों में जैसे- कथा संसार में बताया गया है कि सम्राट विक्रमादित्य स्वयं एक चक्रवर्ती सम्राट थे तथा इनके नाम की उपाधि बाद में कई राजाओं को दी गई। विक्रमादित्य की पुत्री विद्योत्तमा के बारे में भी कई ग्रंथों में जानकारी मिलती है। केरल के ग्रंथ लीला तिलक में कालिदास के ग्रंथ का अनुवाद किया गया है, जिसमें विक्रमादित्य का वर्णन मिलता है।

विक्रमादित्य के समय सम्पूर्ण देश एकजुट था और उनका साम्राज्य आर्यावर्त में चारों दिशाओं में फैला था। उनके जाने के बाद 18 राज्यों में देश बंट गया। भविष्यपुराण में विक्रम-बेताल के रोचक वार्तालाप की जानकारी दी गई है। कई साहित्यिक साक्ष्यों के माध्यम से यह पता चला है कि विक्रमादित्य ने 5 वर्ष से 12 वर्ष की आयु तक अंबावती (आज का आमेर) में तपस्या की थी। विक्रमादित्य के सिंहासन का निर्माण यहीं किया गया था, जहां से बाद में उसे उज्जैन लाया गया। आमेर में आज भी धातु और विभिन्न रत्नों से जड़ित सिंहासन बनाये जाते हैं।

आचार्य श्री केदारनाथ शुक्ल ने कहा कि शतपथ ब्राह्मण की व्याख्या में स्पष्ट रूप से वर्णन है कि यह ग्रंथ श्री हरिस्वामी द्वारा लिखा गया है, जो सम्राट विक्रमादित्य के धर्माध्यक्ष थे। इस ग्रंथ में वर्णन है कि सम्राट विक्रमादित्य सूर्य के समान तेजस्वी दिखाई देते थे। महाकवि कालिदास ने इसकी पुष्टि की है। विक्रमादित्य स्वयं भी रघुवंश से सम्बन्धित थे। उनके चरित्र और धर्म की शैली के बारे में भविष्यपुराण में वर्णन है। विक्रमादित्य को दिग्विजय राजा की उपाधि भी प्रदाय की गई थी।

कार्यक्रम में डॉ.ऋषिकुमार तिवारी, श्री लेखराज शर्मा, डॉ.केतकी त्रिवेदी, डॉ.अजय शर्मा, श्री रमेश शुक्ल, महर्षि पाणिनी संस्कृत विश्वविद्यालय के डॉ.तुलसीदास परोहा और डॉ.आरके अहिरवार मौजूद थे। आभार प्रदर्शन डॉ.रमण सोलंकी द्वारा किया गया।                       (फोटो संलग्न)

क्रमांक 0737                                                              अनिकेत शर्मा/जोशी