September 21, 2018

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“सफलता की कहानी”- रूंधे गले से रेखा मालवीय सिर्फ एक ही शब्द बार-बार कहती हैं- “धन्यवाद मुख्यमंत्रीजी”, श्रमिक पति की मृत्यु पर 2 लाख रूपये की सहायता राशि मिली

01.JPG     उज्जैन 19 जुलाई। हर एक इन्सान के जीवन में कभी न कभी ऐसा दु:खद पल जरूर आता है, जब वह अपने आपको एकदम असहाय और अकेला पाता है। उसे चारों ओर सिर्फ अंधेरा दिखाई देता है और उम्मीद की एक छोटी-सी किरण के लिये वह तरस जाता है। जब वह निराशा में आकंठ डूब जाता है, तब उसे पता चलता है कि कौन अपना है, कौन पराया। कुछ ऐसी ही दुर्घटना लगभग 2 महीने पहले श्रीमती रेखा मालवीय के साथ घटी थी।

43 वर्षीय रेखा मालवीय कुशलपुरा में अपने पति और 2 बच्चों के साथ रहती थीं। पति धर्मपाल मालवीय (उम्र 47 वर्ष) किराये की दुकान में लॉन्ड्री का काम करते थे। 25 मई की सुबह आम सुबहों जैसी ही हुई। उस समय श्रीमती रेखा मालवीय, उनके बच्चों और खुद उनके पति को भी नहीं मालूम था कि आज उनके साथ क्या होने वाला है। बाकी दिनों की तरह धर्मपाल मालवीय जब खाना खाकर घर से दुकान के लिये निकले तो उन्हें नहीं मालूम था कि वे अगले दिन का सूरज नहीं देख पायेंगे।

धर्मपाल मालवीय ने शाम 7 बजे तक दुकान में काम किया फिर अचानक उनके सिर में दर्द उठा, चक्कर आये और वे बेहोश हो गये। परिवार वाले बदहवास उन्हें उज्जैन के एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल लेकर दौड़ते रहे। अन्तत: धर्मपाल को इन्दौर के बॉम्बे हॉस्पिटल रैफर किया गया, जहां अगले दिन सुबह 4 बजे ब्रेन हैमरेज के कारण उनकी मौत हो गई।

“अब हमारा क्या होगा” – इन 4 शब्दों में जैसे सैकड़ों टनों का वजन था, जिन्हें सोचकर धर्मपाल की पत्नी और बच्चे का मन बैठ गया था। जब परिवार इकलौते कमाने वाले व्यक्ति घर के मुखिया का साथ छूट जाता है, उसे अकाल मृत्यु अपना ग्रास बना लेती है तब कुछ भी समझ नहीं आता, सिवाय नियति को कोसने के। धर्मपाल की मौत के बाद उनके अन्तिम संस्कार के बाद 12 दिन उनके परिवार के लिये 12 वर्षों जैसे गुजरे। अन्तिम दिन जब पगड़ी की रस्म के दौरान एक के बाद एक पगड़ी धर्मपाल के 22 वर्षीय बेटे अक्षय मालवीय के सिर पर बांधी जा रही थी, तो उसका सिर बाहर की जगह अन्दर से ज्यादा भारी हो रहा था।

पिता का अन्तिम संस्कार करने के लिये रिश्तेदारों ने पैसों से मदद तो की, मगर इस शर्त के साथ कि एक माह के अन्दर सूद समेत उन्हें पैसे लौटाने होंगे। इसके अलावा घर चलाने की जिम्मेदारी अब धर्मपाल की पत्नी और उसके बेटे पर आ गई थी। धर्मपाल ने अपनी जिन्दगी में बच्चों की पढ़ाई और शादी के लिये कुछ छोटे-मोटे कर्ज भी ले रखे थे। उन्हें भी चुकाना था। ये सब कैसे संभव होगा, इसी चिन्ता में धर्मपाल की पत्नी और बेटा अन्दर ही अन्दर घुल रहे थे। एक होती है मृत्यु, जो पल भर में समाप्त कर देती है, लेकिन उससे भी ज्यादा दर्दनाक होता है तिल तिल कर मरना। जीवनलीला समाप्त होने से ज्यादा पीड़ादायक ऐसा जीवन जीना होता है।

धर्मपाल की पत्नी और उनके बेटे का कहना है कि भगवान दुश्मन को भी वह दौर न दिखाये, जिससे वे दोनों गुजरे। श्रीमती रेखा मालवीय को दूसरों के मैले कुचैले कपड़े धोने के लिये मजबूर होना पड़ा और बेटे अक्षय मालवीय को अपनी पढ़ाई के साथ-साथ पिता की जगह लॉन्ड्री में काम करना पड़ा, लेकिन ईश्वर जब एक दरवाजा बन्द करता है तो तुरन्त दूसरा द्वार भी खोल देता है। मुख्यमंत्री असंगठित मजदूर कल्याण योजना धर्मपाल की पत्नी और बेटे के लिये एक ऐसा ही दरवाजा साबित हुई।

इस बात की गनीमत रही कि धर्मपाल ने इस योजना के अन्तर्गत अपना पंजीयन करवाकर डायरी बनवा ली थी। असमय मृत्यु के बाद धर्मपाल की पत्नी और बेटे को इसी वर्ष श्रमिकों के लिये मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा शुरू की गई इस योजना के बारे में उनके वार्ड कार्यालय से जानकारी मिली। उन्होंने तुरन्त सहायता राशि के लिये नगर पालिक निगम के झोनल कार्यालय में आवेदन दिया। कागजी कार्यवाही और अन्य औपचारिकताएं पूर्ण होने के बाद मात्र 1 महीने के अन्दर 2 लाख रूपये की सहायता राशि धर्मपाल की पत्नी के खाते में आ गई। इन रूपयों से उनका सारा कर्ज भी उतर गया और भविष्य के लिये कुछ राशि भी संरक्षित हो गई। मुख्यमंत्री अन्त्येष्टि सहायता के अन्तर्गत तत्काल 5 हजार रूपये की राशि भी उन्हें शासन द्वारा उपलब्ध कराई गई।

श्रीमती रेखा मालवीय जब भी उस पल को याद करती हैं तो सिहर जाती हैं। उनका मन भारी हो जाता है और गला रूंध जाता है, लेकिन ऐसे मुश्किल वक्त में शासन की ओर से जो भी उनके लिये किया गया उसके लिये मुख्यमंत्री श्री चौहान के लिये उनके मन से सिर्फ एक ही शब्द निकलता है, वह है ‘धन्यवाद’। बाकी अभिव्यक्ति उनकी आंखों से निकलते आंसू कर देते हैं। अपनी मां का सहारा बने अक्षय मालवीय कहते हैं कि वे ये सब नहीं कर पाते, अगर उन्हें उस वक्त मुख्यमंत्री असंगठित मजदूर कल्याण योजना का सहारा नहीं मिला होता। उनके पिता की कमी तो अब कभी पूरी नहीं हो सकेगी, लेकिन यह योजना अक्षय के सिर पर पिता के साये की तरह ही साबित हुई है।                         (फोटो संलग्न)

क्रमांक 2068                                                                                                  अनिकेत शर्मा/जोशी